कितनी तेज बरसात हो रही है,
चलो ना बादलों के पार चलते हैं
बरसात भी कोई घर में बैठने का मौसम है?
उड़ चलते हैं आसमान में
चिड़ा और चिड़िया की तरह अलग अलग नहीं
इंसानों की तरह हाथों में हाथ डाले
लट्टू की तरह गोल -गोल घूमते हुए बारिश में
ऊपर से नीचे तक सरोबार हो जाते हैं
कितनी तेज बरसात हो रही है,
चलो ना बादलों के पार चलते हैं
बाथटब के गीले झाग से बादलों को लपेट लेते हैं अपने चारों ओर
और नृत्य करते हैं जैसे स्टेज पर कोई नकली धुंध के बीच करता हो
रिसने देते हैं उसके गीलेपन को अपने अंदर
और धीरे-धीरे घुलकर, बहकर, बरसात में उफनती
दो नदियों की तरह एक हो जाते हैं
कितनी तेज बरसात हो रही है,
चलो ना बादलों के पार चलते हैं
और फिर उड़ चलते हैं और आगे, बादलों के पार,
चांद,तारों,सितारों, ग्रहों, नक्षत्रों, आकाश गंगा के भी पार....
वहां जाकर, एक-दूसरे को पाकर,
सब कुछ पा चुके किसी अमर सितारे की तरह जल जाते हैं,
मिट जाते हैं, शून्य में विलीन हो जाते हैं,
सारे ब्रह्मांड को धारण करने वाला शून्य बन जाते हैं....
कितनी तेज बरसात हो रही है, चलो ना बादलों के पार चलते हैं...
मुकेश
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।