सब नरेन्द्र पशुतुल्य हैं,क्या ब्राह्मण क्या सूद।
अंतस में जिनके नहीं,मानवता मौजूद।।
होता है जिस छंद में,जितना अधिक प्रवाह।
होता है उतना अधिक,लफ्ज़-लफ्ज़ पर वाह।।
भला भलाई कौन करे,जबरन मेरे यार।
आज तलक देखा नहीं, ऐसा चौकीदार।।
चोरी,हत्या,लूट का,जिन पे लाखों केस।
आज वहीं सिरमौर हैं,चले उन्हीं से देश।।
मिथ्या लगती फूल है,कड़वी लगती शूल।
यही जगत का भूल है,यही जगत का रूल।।
••••
नरेन्द्र सोनकर 'कुमार सोनकरन' प्रयागराज।
-हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।