हमारे पसीने को फल बेशक़ मिलता है
जिसका जितना है, उतना हक़ मिलता है
और ये गलत है कि फुर्सतदारों की बस्ती गरीब है
यहां कुछ नहीं मिलने वालों को सबक मिलता है
कि लगाकर दांव पर ख़ुद को भी निराश मत होना
जिन्हें जमीं नहीं मिलती उन्हें फ़लक मिलता है
और जिनकी नसों में सिर्फ़ पानी दौड़ता है
अक्सर उन्हीं की दाल में ज्यादा नमक मिलता है
सियासत भी क्या गज़ब की चीज है यारों
कड़वी जुबां वालों को शहद मिलता है
ईमानदारी की टपकती छत के नीचे वालों का कुछ नहीं होगा
यहां सिर्फ़ हवेलीदारों को ही महल मिलता है....
-प्रशांत मिश्रा
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