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नज़र

Pramod Verma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            नज़र
        
                                                    
                            
कभी नज़रें मिलाकर
आंखें चार करती हैं
कभी नज़रें झुकाकर
शर्मसार करती हैं
कभी तिरछी नज़रें
दिल घायल करती है
कभी सीधी नज़रें
दिल की धड़कन बढ़ाती है
कभी कातिल नज़रें
इश्क का पैगाम देती है
कभी मायूस नज़रें
हाले- ए- दिल दिल बयां करती है
कभी बेचैन नज़रें
मोहब्बत का पैगाम भेजती हैं
कभी एक नज़र में
मोहब्बत हो जाती है
कभी मासूम नज़रें
कुछ भी नहीं देख पाती है
2 वर्ष पहले
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