क्यूँ नए दर्द-ओ-अलम नित पी रहे हैं हम
क्या करें ज़िंदा हैं जब तक जी रहे हैं हम
हो चुकी मैली ज़मीं मैला समाँ और आसमाँ
कुछ परिंदे लौटकर आए न सम्त-ए-आशियाँ
हूँ मैं प्यादा खेल का जिसकी न शह न मात है
मौत के आगे है मंज़िल ये तो बस शुरुआत है
देखता तू जा रे बंदे ये महज़ है इब्तिदा
तेरे हाथों से लिखी जाएगी तेरी ही कथा
ये सम्भलकर चलने वाले एक दिन गिर जाएंगे
इस क़दर टूटेंगे फिर न ये कभी उठ पाएंगे
फिर लगाएगा ख़ुदा के सामने तू अर्ज़ियाँ
सब धरी रह जाएंगी उस वक़्त तेरी मर्ज़ियाँ
क्या सही और क्या गलत ये कौन फिर बतलाएगा
दिल में उलझी सी गिरह को कौन फिर सुलझाएगा
वो है साहिल वक़्त का और तू समाँ ठहरा हुआ
वक़्त के ही साथ जैसे राज़ ये गहरा हुआ
फिर तेरे नक़्श-ए-कदम भी एक दिन मिट जाएंगे
जिस्म के मोती निकलकर सीप से मिल जाएंगे
किस्मतों से ही मिलेंगे सारे ये संयोग फिर
यूँ मयस्सर हो सकेगा ना ये मौका रोज़ फिर
फिर रुदन का भी ना अवसर तू अभागा पाएगा
जो समेटे फिर रहा ग़ाफ़िल धरा रह जाएगा
फिर मयस्सर हो सकेंगी ना ये रातें चाँदनी
फिर ये दिन भी दिन रहेगा ना रहेगी रागिनी
दृश्य भीषण ही रहा है आँखों के सम्मुख तेरे
दुःख में ही तब्दील होते आए हैं सब सुख तेरे
था वो कोई और जो मैदान-ए-जंग में मर गया
कृष्ण के हाथों बिखरकर इस जहाँ से तर गया
इस सफ़र के बाद भी बाकी है क्या कोई सफ़र
जन्म से मृत्यु तलक़ की रहगुज़र है मुख़्तसर
एक मंज़िल एक रहबर एक मेरा रासता
हम-नफ़स है एक मेरा एक से है वासता
किसके हाथों से ये ज़हराब पी रहे हैं हम
क्या करें ज़िंदा हैं जब तक जी रहे हैं हम
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