खुशियाँ ढूंढ़ता हूँ ,
दर-दर भटकता हूँ ,
बेचैन दिल को सुकून मिलता हैं ,
कलम से जज़्बातों को ,
जब-जब कविता का रूप देता हूँ |
कवि हू, कतई इसका प्रमाण नहीं देता,
पर कविता के बिना अधूरा हूँ ,
कभी इस बात से इनकार नही करता |
कवि का हाल बुरा है ,
जज़्बातों का जाल बड़ा है ,
क्या लिखूँ , क्या छोड़ू ,
इस कशमकश में हाथ रुके हैं , कलम थके हैं ,
मन में अंतरदवंद है चालू ,
जो जीत गया वह ,
कोरे कागज पर उतर गया ,
जो हार गया वह अंतर्मन मे दब गया ,
इस तरह एक कविता रचित हो जाती हैं ,
चार पल सुकून मिलता हैं , कवि खुश होता हैं ,
अगले ही पल पुन: जज़्बातों का दवंद चालू होता हैं ,
कवि बेचैन होता है,
फिर से एक कविता का उदय होता है |
कवि, कलम, कविता का यह प्रक्रिया अनवरत चलता रहता हैं ,
श्रोता इन जज़्बातों मे डूब कर प्रफुल्लित होते रहते हैं ,
कुछ कवि महान हो जाते है , कुछ गुमनाम रह जाते है ,
कवि इन बातों से अनजान जज़्बातों के नक्काशी में लिन रहते है ,
खुद बेचैन होकर , लोगों के लिए कवि बन जाते हैं ,
खुद बेचैन होकर , लोगों के लिए कवि बन जाते हैं ||
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