विज्ञापन

बेटियां

Ritu Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बेटियां घर की रौनक होती है,
        
                                                    
                            
बेटियां घर की शान
बिन बेटी के सूनी धरती,
सूना है जहान।

लक्ष्मी का अवतार कहीं तो,
कहीं दुर्गा का नाम,
बेटी का अपमान जो करते,
रहते वो कंगाल।

घर की बरकत,
घर की ख़ुशियां,
बिन बेटी के सूनी,
प्यार बांटती,
परिवार बनाती,
आंगन की है तुलसी।

दुःख सहती हैं,
चुप रहती हैं,
आंसू छुपा लेती हैं,
पालनहारी, अनपूर्णा,
देवी कहलाती हैं।

कवित्री:ऋतु कुमार


हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें। 
5 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Aalam-e-Ghazal Parvez

265 कविताएं

View Profile

Yunush khan

7864 कविताएं

View Profile

Anamika singer

344 कविताएं

View Profile