दायरा नहीं,
लिहाज नहीं,
कोई शर्म नहीं,
नहीं समाज के इनविजिबल लोगों की परवाह
यह स्थिति बड़ी अजीब है...
जान भी, जहान भी
मान भी, अभिमान भी
हिम्मत भी, हौसला भी,
अधूरा भी और पूरा भी,
धिक्कार भी, फटकार भी,
अपमान भी, जिल्लत भी,
फजीहत भी, शर्मसार भी,
यह स्थिति बड़ी अजीब है....
शायद, यह वही बेहद वाला
स्थिति और एहसास है
जो खुद को
खुद से लड़ना सिखाता है
चलाना सिखाता है
दौड़ना सिखाता है
गिर कर उठना और फिर संभलना
सिखाता है....
मानो या न मानो,
यह स्थिति बड़ी अजीब है....
-इन्द्रमणि साहू