उम्मीद
उम्मीद की कच्ची डोर का सहारा लिए सुकून का दरिया ढूढने चली थी
उम्मीदों के पंख लगाकर आसमां का सफर तय करने चली थी
पता था झूठ सिर्फ शोर करता हैं
फिर भी उसी शोर में खुद को समझाने की आरजू लिए निकल पड़ी थी
सोचा नहीं की खुद की कमजोरियां बताकर अपनी अहमियत कम कर रही
लगता था समझ को समझकर ही आगे बढ़ रही
मालूम न था कि बुलंदियों को छूना है तो खुद को बदलना जरूरी हैं
उम्मीदों का चोला डाले मैं तो बस नाच रही थी
जब हकीकत का तूफ़ान आया तो आंखे खुली तब दिखा तो सब फरेब था मैं तो खुद का तमाशा बना रही थी
अब तो परख लिया सब
सच ही कहां है किसी ने
कि बड़ी चोट बड़े घाव नही देती
छोटी छोटी बातें भी गहरे जख्म दे जाती है
फिर समझाया खुद को ए दिल ए नादान तुझे तू ही समझेगा बहतर
नही तो उम्मीद ही थप्पड मारती है खींचकर
यहां न कोई गलत है न कोई मतलबी
बस तू समझ सब को अजनबी
अब हम फिर से उड़ चले एक नई उमंग के साथ
पर बिना उम्मीद के......
चलेंगे इस डगर पर सीखते अपनाते पर लगाकर पंख असलियत के....
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