बाह। अयोध्या हनुमान गढ़ी की शाखा बमरौली कायस्थ में लगने वाला 500 साल पुराना मेला क्षेत्रीय दायरे में सिमटता जा रहा है। यहां कभी सोने का बाजार सजता था। दुल्हन के जेवरों से लेकर दहेज का तमाम सामान लोग इसी मेले से खरीदा करते थे। बदले वक्त में मेले की परंपरा का निर्वहन तो आज भी हो रहा है लेकिन अतीत के गौरवमयी पलों को लौटाने की फिर से कवायद की जा रही है।
चंबल नदी के जंगल में बसा बमरौली कायस्थ गांव की वीरान हवेलियां समृद्धशाली प्राचीन इतिहास का गवाह है। 500 साल पुराने मेला अयोध्या की हनुमानगढ़ी शाखा से जुड़ा हुआ है। सदियों पहले यहां पर हीरे, मोती और सोने का बाजार सजता था। कपड़े, पीतल के बर्तनों और लकड़ी के सामान की खरीद-फरोख्त को राजस्थान-मध्य प्रदेश तक के लोग पहुंचते थे। पूर्णिमा से अमावस्या तक चलने वाले मेले की रस्म अदायगी तो आज भी हो रही है। क्षेत्रीय दायरे में सिमटे मेले में कभी मलूक पीढ़ाधीश्वर राजेंद्र डकैतों के दल देखभाल कर रहे बाबा प्रेमदास जी महाराज को अयोध्या से यहां भेजा गया। उजड़ते मेले को फिर से आबाद करने की कोशिश इस साल उन्होंने की है। अतिक्रमणकारियों द्वारा मेला क्षेत्र की कब्जाई गई जमीन को फिर से हासिल करने की उन्होंने कवायद शुरू कर दी है। आजकल लग रहे मेले में क्षेत्रीय लोग खरीददारी और दर्शन को पहुंच रहे है। मेले को आबाद करने में क्षेत्रीय लोग भी सहयोग कर रहे हैं। मुक्ताप्रसाद कायस्थ द्वारा बसाये गांव में उनके द्वारा सजाया-संवारा गया। मेला फिर से आबाद होने की आस जगी है।