आगरा। रेजिस्टेंट टीबी (दवाआें का असर नहीं होना) अब लाइलाज नहीं रहा। बीडाक्यूलेन ड्रग की खोज से यह संभव हुआ है। अमेरिका के बाद शोध में यह दवा भारतीय मरीजों पर भी असरदार साबित हुई। संभावना है कि नए साल से यह दवा इलाज के लिए उपलब्ध होगी। यहां चल रहे इंडियन चेस्ट सोसायटी की कान्फ्रेंस नैपकान-2014 का तीसरा दिन ट्यूबरक्लोसिस (टीबी) के इलाज पर विचार-विमर्श के नाम रहा।
दवा बीच में छोड़ना या गलत दवाआें का इस्तेमाल के कारण टीबी ड्रग रेजिस्टेंट हो जाती है। भारत में हर साल ऐसे तीन फीसदी नए मरीज सामने आ रहे हैं। इस टीबी से होने वाली मौतें चुनौती बनी हुई हैं। अमेरिकी वैज्ञानिकों ने बीडाक्यूलेन ड्रग के रूप में इसका इलाज खोजा। भारतीय मरीजों पर दवा के रिसर्च से जुड़े जवाहर लाल नेहरू मेडिकल कालेज, अलीगढ़ के प्रोफेसर डा. राकेश भार्गव ने बताया कि प्रदेश के विभिन्न शहरों के 15-15 मरीजों को यह दवा दी गई। परिणाम संजीवनी जैसा मिला। विषय पर एसएन मेडिकल कालेज के क्षय एवं वक्ष रोग विभागध्यक्ष डा. संतोष कुमार, डा. जुबैर अहमद, डा. गजेंद्र विक्रम सिंह, डा. मोहम्मद शमीम ने भी व्याख्यान दिए।
कम होगा कोर्स और दवाएं भी
टीबी मरीज की अभी छह महीने दवा चलती है। ये ‘हैवी डोज’ होती हैं और इनसे मरीज में हेपेटाइटस और पीलिया खतरा बढ़ जाता है। अब ये दवाएं चार महीने तक ही दी जाएंगी। संख्या भी कम होगी। डा. भार्गव ने बताया कि बिल गेट्स एंड मंडेला फाउंडेशन के सहयोग से अफ्रीका और भारत में नई दवाओं पर शोध हुआ। भारत में नई दवाएं खोजी जा चुकी हैं। जल्द ही इनसे इलाज शुरू हो सकेगा।
तंबाकू कम पर खतरनाक बीड़ी ही
फेफड़े की टीबी का बड़ा कारण धूम्रपान हैं। इससे मौत बीड़ी पीने वालों की ज्यादा होती है। बल्लभभाई पटेल चेस्ट इंस्टीट्यूट, दिल्ली के डायरेक्टर डा. राजेंद्र प्रसाद ने अपने शोध के हवाले से बताया कि यूपी में बीड़ी-सिगरेट पीने वालों का अनुपात 70:30 है। बीड़ी में (.20 ग्राम) और सिगरेट में (.80 ग्राम) तंबाकू होती है, फिर भी बीड़ी ज्यादा खतरनाक है। कारण, पत्ते से निर्मित बीड़ी संकरी होती है। सिगरेट के मुकाबले कश लेने में ज्यादा दम लगता है और तंबाकू सीधे फेफड़ों पर हमला करती है।