बांदा। गांवों को सरसब्ज करने की योजनाओं और नेताओं के दावों में दम देखना है तो अतर्रा ग्रामीण के मजरा मुरलिया पुरवा देखें। यहां पर समस्याओं का डेरा है। सड़क पर निकलो तो घुटनों तक दलदल है। हर परिवार कर्जदार है। बचे-खुचे किसानों की जमीनें गिरवी रखी हैं। पढ़ने वाले दिनों में बालक आसपास के कसबों में जूठे बर्तन धो रहे हैं।
बरसात में मुरलिया पुरवा में जीवन नरकीय बनकर रह गया है। गलियों में घुटनों तक दलदल है। कोई बीमार हो जाए तो उसकी खाट कांधे पर रखकर इन्हीं गलियों से गुजरना पड़ता है। हाल ही में गुड़िया नामक महिला को खाट पर ले जाते समय रास्ते में ही प्रसव हो गया। गांव की इस दुर्गति से तंग आकर हरिश्चंद्र, बिहारी, कल्लू, सरजू, फूला, शिव कुमार आदि पलायन कर गए। श्यामलाल, बहिरा, किशोरी, भउवा आदि के घरों में ताले पड़े हैं। यह परिवार दिल्ली, सूरत और गुजरात चले गए। सत्तीदीन, गोरेलाल, मन्नी, बच्चा और फूल सिंह आदि 6 से 14 वर्ष के दर्जनों बच्चे अतर्रा नगर के होटलों में प्लेटें धोकर बचपना बिता रहे हैं। गांव का हर परिवार कर्जदार है। मातादीन की 6 बीघा भूमि 80 हजार के कर्ज में बिक गई। कमोवेश यही स्थिति और भी कई लोगों की है। बेटी की शादी के लिए सिर्फ 15 हजार रुपये में विकलांग चुनूबाद ने मकान बेच दिया। अब वह सिर छिपाने के लिए भटक रहा है। इलाज के अभाव में पिछले वर्ष बेटालाल की मौत हो गई। उस पर 45 हजार रुपये कर्ज था। कर्ज बैंक और साहूकारों से लिया गया है। विद्याधाम समिति मंत्री राजाभइया बताते हैं कि नरैनी क्षेत्र में मुरलिया पुरवा जैसे न जाने कितने गांव हैं। शासन-प्रशासन, नेता सिर्फ यहां वोट लेने आते हैं और फिर वायदे भूल जाते हैं।