वृंदावन। संगीत शिरोमणि स्वामी हरिदासजी की संगीत साधना पर रीझकर ठाकुर बांके बिहारी महाराज निधिवनराज के लताकुंज के मध्य से प्रकट हुए थे। इस दौरान स्वामीजी को एक अद्भुत प्रकाश का अनुभव हुआ था।
ललिता सखी के अवतार स्वामी हरिदासजी वृंदावन आकर निधिवनराज में निवास कर संगीत साधना में लीन हो गए। एक दिन वे नेत्र मूंदे बैठे थे, हाथ तानपूरे पर था और संगीत साधना में लीन थे तभी उन्होंने एक अद्भुत प्रकाश का अनुभव किया। कुछ ही क्षणाें में प्रकाश पुंज बढ़ता गया। प्रकाश पुंज के मध्य परस्पर हाथ थामे हुए निधिवनराज की लता कुंज के बीच से श्यामाकुंज बिहारी ने उन्हें दर्शन दिए। वह दिन अश्विन शुक्ला पंचमी संवत 1562 बुधवार का था। उसी दिन को बांके बिहारी के प्राकट्य दिवस के रूप में मनाया जाता है।
बांके बिहारी मंदिर के सेवायत ब्रजकिशोर गोस्वामी बताते हैं कि स्वामी हरिदास ने अपने लाड़ले ठाकुर बांके बिहारी महाराज के प्रकट होने पर अपने तानपूरे पर माई री सहज जोरी प्रकट भई, जु रंग की गौर श्यामा धन दामिनी। प्रथम हूं हुती, अबहूं आगे हूं रहिहै, न टरिहै तैसें...पद गाकर रिझाया। वृंदावन की नित नवल निकुंजों में रमण करने वाले श्याम कुंजबिहारी की युगल छवि स्वामी हरिदास की प्रार्थना पर बांके बिहारी के रूप में स्थापित हो गई। कुछ वर्ष निधिवनराज में स्वामी हरिदास ने बांके बिहारी की पूजा की। इसके बाद भव्य मंदिर का निर्माण कर ठाकुरजी के श्रीविग्रह को वहां स्थापित किया गया। मंदिर में आज भी बांके बिहारी श्रद्धालुओं को दर्शन दे रहे हैं। हर वर्ष बिहार पंचमी पर निधिवनराज मंदिर में विविध धार्मिक आयोजन किए जाते हैं।