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स्टाफ कम, जनता की जान लेने की छूट
अमर उजाला ब्यूरो/कानपुर
Updated Fri, 10 Jun 2016 01:05 AM IST
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वैन में लगी आग
- फोटो : ANI
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कानपुर। चौपहिया-तिपहिया कामर्शियल वाहनों जैसे ट्रक, बस, कार, जीप, टेंपो, लोडर आदि से हादसों की संख्या बढ़ रही है। मंगलवार को ही दादानगर में एक बस ने एक युवक की जान ले ली। ट्रकों से तो रोज ही हादसे होते हैं। ‘अमर उजाला’ ने पब्लिक की जान-माल से जुड़े इस मुद्दे की परतें उधेड़ीं तो चौंकाने वाली बात पता चली। ‘अमर उजाला’ संवाददाता की आरटीआई से पता चला है कि आरटीओ विभाग सिर्फ सवा दो मिनट में एक वाहन की फिटनेस ओके कर देता है। दो मिनट में एक वाहन को ओके करना असंभव है। फिटनेस में इसी धांधली के कारण दुर्घटनाएं बढ़ रही हैं और निर्दोष लोगों की जान जा रही है। एआरटीओ (प्रशासन) प्रभात पांडेय मानते हैं कि जल्दी में फिटनेस की जाती है क्योंकि स्टाफ कम है। यानी स्टाफ कम है तो जनता की जान लेने की छूट है।
पिछले दिनों केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने कहा था कि वाहन दुर्घटनाओं के मामलों में कानपुर देश में दूसरे नंबर पर है। इसकी वजह आरटीओ विभाग की अंधेरगर्दी है। एडिशनल ट्रांसपोर्ट कमिश्नर रोड सेफ्टी गंगाफल ने भी अप्रैल में आरटीओ दफ्तर का निरीक्षण कर वाहनों की फिटनेस जांच पर सवाल उठाया था। इसके बाद ‘अमर उजाला’ संवाददाता ने आरटीओ दफ्तर में आरटीआई डालकर वाहनों की फिटनेस के बारे में सवाल पूछे थे। बुधवार को इस आरटीआई का जवाब मिला। इसके मुताबिक आरटीओ दफ्तर ने एक अप्रैल से 30 अप्रैल तक कुल 3381 वाहनों के फिटनेस टेस्ट किए। अब जरा गौर करें, अप्रैल में चार रविवार और एक सेकेंड सैटरडे को छुट्टी रही। अन्य छुट्टियां भी थीं। अगर हम पांच छुट्टी ही मान लें तो 25 दिन में 3381 वाहनों की फिटनेस हुई। सुबह सात से आठ बजे तक यानी एक घंटे फिटनेस होती है। इस तरह केवल सवा दो मिनट में एक वाहन की फिटनेस कर दी गई। एआरटीओ प्रशासन का दावा है कि तीन घंटे फिटनेस होती है। अगर तीन घंटे भी फिटनेस मान ली जाए तो करीब पांच मिनट में फिटनेस हो जाती है। ट्रक-बस या अन्य वाहनों की फिटनेस दो या पांच मिनट में होना अपने आप में आरटीओ विभाग में चल रहे अंधेरगर्दी का सबूत है। श्रेणीवार फिटनेस टेस्ट के लिए हर रोज एक तकनीकी अधिकारी, एक लिपिक, एक चतुर्थश्रेणी कर्मचारी की ड्यूटी रहती है। तकनीकी अधिकारी जय सिंह का कहना है कि फिटनेस के समय वाहन की फिजिकल जांच होती है। इसके बाद वाहन स्टार्ट कराया जाता है। क्लच और ब्रेक की स्थिति देखते हैं। मौके पर ही फिटनेस रिपोर्ट भरते हैं। ऐसे में यह काम दो या पांच मिनट में संभव ही नही हैं।
पिछले दिनों केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने कहा था कि वाहन दुर्घटनाओं के मामलों में कानपुर देश में दूसरे नंबर पर है। इसकी वजह आरटीओ विभाग की अंधेरगर्दी है। एडिशनल ट्रांसपोर्ट कमिश्नर रोड सेफ्टी गंगाफल ने भी अप्रैल में आरटीओ दफ्तर का निरीक्षण कर वाहनों की फिटनेस जांच पर सवाल उठाया था। इसके बाद ‘अमर उजाला’ संवाददाता ने आरटीओ दफ्तर में आरटीआई डालकर वाहनों की फिटनेस के बारे में सवाल पूछे थे। बुधवार को इस आरटीआई का जवाब मिला। इसके मुताबिक आरटीओ दफ्तर ने एक अप्रैल से 30 अप्रैल तक कुल 3381 वाहनों के फिटनेस टेस्ट किए। अब जरा गौर करें, अप्रैल में चार रविवार और एक सेकेंड सैटरडे को छुट्टी रही। अन्य छुट्टियां भी थीं। अगर हम पांच छुट्टी ही मान लें तो 25 दिन में 3381 वाहनों की फिटनेस हुई। सुबह सात से आठ बजे तक यानी एक घंटे फिटनेस होती है। इस तरह केवल सवा दो मिनट में एक वाहन की फिटनेस कर दी गई। एआरटीओ प्रशासन का दावा है कि तीन घंटे फिटनेस होती है। अगर तीन घंटे भी फिटनेस मान ली जाए तो करीब पांच मिनट में फिटनेस हो जाती है। ट्रक-बस या अन्य वाहनों की फिटनेस दो या पांच मिनट में होना अपने आप में आरटीओ विभाग में चल रहे अंधेरगर्दी का सबूत है। श्रेणीवार फिटनेस टेस्ट के लिए हर रोज एक तकनीकी अधिकारी, एक लिपिक, एक चतुर्थश्रेणी कर्मचारी की ड्यूटी रहती है। तकनीकी अधिकारी जय सिंह का कहना है कि फिटनेस के समय वाहन की फिजिकल जांच होती है। इसके बाद वाहन स्टार्ट कराया जाता है। क्लच और ब्रेक की स्थिति देखते हैं। मौके पर ही फिटनेस रिपोर्ट भरते हैं। ऐसे में यह काम दो या पांच मिनट में संभव ही नही हैं।
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