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Una News: बिनौला खल और काले बिनौला के दामों में भारी उछाल, दुग्ध उत्पादक परेशान
संवाद न्यूज एजेंसी, ऊना
Updated Sat, 13 Jun 2026 12:08 AM IST
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बड़ूही(ऊना)। पशुपालकों और दुग्ध उत्पादकों के लिए इन दिनों पशु आहार की लगातार बढ़ती कीमतें चिंता का विषय बनी हुई हैं। बिनौला खल के दामों में वृद्धि ने किसानों और डेयरी संचालकों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। पशुपालकों का कहना है कि पशु आहार के बढ़ते खर्च के कारण पशुपालन व्यवसाय की लागत लगातार बढ़ रही है, जबकि दूध के दाम उस अनुपात में नहीं बढ़े हैं।
जानकारी के अनुसार पिछले माह 50 किलोग्राम बिनौला खल का बैग करीब 2,500 रुपये में बिक रहा था, जो अब बढ़कर 2,600 रुपये से ऊपर पहुंच गया है। वहीं काले बिनौला की कीमत पहले लगभग 5,500 से 5,800 रुपये प्रति क्विंटल थी। अब बढ़कर 6,300 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गई है। पशुपालकों का कहना है कि इस बार बिनौला खल और काले बिनौला के दामों में बढ़ोतरी ने पुराने सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। इसके चलते कई किसानों ने अब वैकल्पिक उपाय अपनाने शुरू कर दिए हैं। पशुओं को बाजार के महंगे चारे के बजाय घर में मक्की और गेहूं का दरड़ तैयार कर खिलाया जा रहा है। जानकारों के अनुसार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ईरान-अमेरिका तनाव, कच्चे तेल और गैस की कीमतों में उतार-चढ़ाव तथा परिवहन लागत में वृद्धि का असर कृषि और पशुपालन क्षेत्र पर भी पड़ रहा है। पशुपालकों का कहना है कि पशुपालन महंगा व्यवसाय बन चुका है। पशु आहार, दवाइयों, बिजली और अन्य आवश्यक वस्तुओं की बढ़ती कीमतों के कारण अब घरों में एक पशु रखना भी कठिन होता जा रहा है। कई परिवार पशुपालन से दूरी बनाने लगे हैं। पशुपालकों ने सरकार से राहत की मांग की है।
इस संबंध में पशु चिकित्सालय चूरूडू के वरिष्ठ पशु चिकित्सक डॉ. मोहित कुमार ने बताया कि पशुओं को केवल बिनौला खल या बिनौला पर निर्भर रखना उचित नहीं है। यदि पशुपालक संतुलित मात्रा में हरा चारा, सूखा चारा, मक्की का दरड़, गेहूं का चोकर तथा खनिज मिश्रण का उपयोग करें तो पशुओं की उत्पादन क्षमता को काफी हद तक बनाए रखा जा सकता है।
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पशुओं के चारे पर होने वाला खर्च पहले की तुलना में काफी बढ़ गया है जबकि दूध के दाम उस अनुपात में नहीं बढ़े हैं। ऐसे में डेयरी व्यवसाय से होने वाला लाभ लगातार कम हो रहा है।
- रवि दत्त, दुग्ध उत्पादक टकारला
बड़े स्तर पर पशुपालन करने वालों के लिए महंगाई की स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण हो गई है। पशु आहार, बिजली, दवाइयों और मजदूरी पर खर्च बढ़ रहा है, जिससे उत्पादन लागत में भारी इजाफा हुआ है। यदि यही स्थिति रही तो कई डेयरी संचालकों को अपना कारोबार सीमित करना पड़ सकता है। सरकार को इस ओर ध्यान देना चाहिए।
-अनुराग, डेयरी संचालक टकारला
जानकारी के अनुसार पिछले माह 50 किलोग्राम बिनौला खल का बैग करीब 2,500 रुपये में बिक रहा था, जो अब बढ़कर 2,600 रुपये से ऊपर पहुंच गया है। वहीं काले बिनौला की कीमत पहले लगभग 5,500 से 5,800 रुपये प्रति क्विंटल थी। अब बढ़कर 6,300 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गई है। पशुपालकों का कहना है कि इस बार बिनौला खल और काले बिनौला के दामों में बढ़ोतरी ने पुराने सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। इसके चलते कई किसानों ने अब वैकल्पिक उपाय अपनाने शुरू कर दिए हैं। पशुओं को बाजार के महंगे चारे के बजाय घर में मक्की और गेहूं का दरड़ तैयार कर खिलाया जा रहा है। जानकारों के अनुसार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ईरान-अमेरिका तनाव, कच्चे तेल और गैस की कीमतों में उतार-चढ़ाव तथा परिवहन लागत में वृद्धि का असर कृषि और पशुपालन क्षेत्र पर भी पड़ रहा है। पशुपालकों का कहना है कि पशुपालन महंगा व्यवसाय बन चुका है। पशु आहार, दवाइयों, बिजली और अन्य आवश्यक वस्तुओं की बढ़ती कीमतों के कारण अब घरों में एक पशु रखना भी कठिन होता जा रहा है। कई परिवार पशुपालन से दूरी बनाने लगे हैं। पशुपालकों ने सरकार से राहत की मांग की है।
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इस संबंध में पशु चिकित्सालय चूरूडू के वरिष्ठ पशु चिकित्सक डॉ. मोहित कुमार ने बताया कि पशुओं को केवल बिनौला खल या बिनौला पर निर्भर रखना उचित नहीं है। यदि पशुपालक संतुलित मात्रा में हरा चारा, सूखा चारा, मक्की का दरड़, गेहूं का चोकर तथा खनिज मिश्रण का उपयोग करें तो पशुओं की उत्पादन क्षमता को काफी हद तक बनाए रखा जा सकता है।
पशुओं के चारे पर होने वाला खर्च पहले की तुलना में काफी बढ़ गया है जबकि दूध के दाम उस अनुपात में नहीं बढ़े हैं। ऐसे में डेयरी व्यवसाय से होने वाला लाभ लगातार कम हो रहा है।
- रवि दत्त, दुग्ध उत्पादक टकारला
बड़े स्तर पर पशुपालन करने वालों के लिए महंगाई की स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण हो गई है। पशु आहार, बिजली, दवाइयों और मजदूरी पर खर्च बढ़ रहा है, जिससे उत्पादन लागत में भारी इजाफा हुआ है। यदि यही स्थिति रही तो कई डेयरी संचालकों को अपना कारोबार सीमित करना पड़ सकता है। सरकार को इस ओर ध्यान देना चाहिए।
-अनुराग, डेयरी संचालक टकारला